मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 56
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रखवाले (पास्टर) की भूमिका (2)
पिछले लेख में हमें इफिसियों 4:11 में दी गई चौथी सेवकाई, परमेश्वर के झुण्ड का चरवाहा, या रखवाला अर्थात पास्टर होने के बारे में देखा था। हमने मूल यूनानी भाषा में प्रयोग किए गए शब्द के द्वारा देखा और समझा था कि रखवाले या पास्टर का कार्य भेड़ों की रखवाली और देखभाल करने वाले चरवाहे के समान ही होता है। वचन हमने यह भी सिखाता है कि प्रभु यीशु ही हमारा "प्रधान रखवाला" है, और प्रत्येक रखवाले को प्रभु के समान और उसकी अधीनता में होकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना है; क्योंकि प्रत्येक चरवाहे को एक न एक दिन अपने कार्य का हिसाब प्रभु को देना होगा। फिर हमने भजन 23 से रखवाले द्वारा सकारात्मक रीति से अपने दायित्व के निर्वाह के बारे में देखा था। आज हम एक बार फिर, पुराने नियम से ही रखवाला होने के दायित्व के नकारात्मक निर्वाह के बारे में देखेंगे।
कलीसिया के रखवाले के लिए भजन 23 के इस सकारात्मक उदाहरण की तुलना में, यहेजकेल 34 अध्याय में इस्राएल के चरवाहों द्वारा अनेकों प्रकार से परमेश्वर की भेड़ों के प्रति उनकी लापरवाही और परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता के नकारात्मक व्यवहार के उदाहरण दिए गए हैं, और उनके इस दुर्व्यवहार के लिए परमेश्वर द्वारा उनकी भर्त्सना करने, और उन्हें दण्ड देने, तथा अपनी भेड़ों को संभालने का वर्णन है। यहेजकेल 34:2-6 में चरवाहों के दुर्व्यवहार को बताया गया है, और शेष अध्याय परमेश्वर द्वारा स्थिति को नियंत्रण में लेने, अपनी भेड़ों को संभालने, एकत्रित करने, उनकी सही देखभाल करने, तथा चरवाहों से हिसाब लेने, उनको उनका दण्ड देने का वर्णन है।
हम यहेजकेल 34:2-6 में चरवाहों द्वारा दायित्वों को नहीं निभाने के बारे में देखते हैं:
* पद 2 - वे अपने पेट भरते थे, किन्तु भेड़-बकरियों के पेट भरे होने की चिन्ता नहीं करते थे।
* पद 3 - वे अपने लिए सर्वोत्तम भोजन और कपड़ों का इंतज़ाम रखते थे, किन्तु भेड़-बकरियों को उनके लिए उपयुक्त भोजन के स्थान पर नहीं ले जाते थे।
* पद 4 - वे बीमारों, रोगियों, घायलों की चिन्ता नहीं की, न उनके उपचार के लिए प्रावधान किए। न ही उन चरवाहों ने खोई हुई या निकाली हुई भेड़ों को फिर से झुण्ड में लौटा लाने के लिए कोई प्रयास किया। वरन् वे चरवाहे बल और ज़बरदस्ती से भेड़ों पर अधिकार जताते थे।
* पद 5 - समय और अवसर पर चरवाहों के भेड़ों के साथ उपस्थित न होने के कारण भेड़ें तितर-बितर हो गईं, वन पशुओं का आहार हो गईं।
* पद 6 - भेड़ों के तितर-बितर हो जाने, इधर-उधर भटकने के बावजूद, चरवाहों ने उनकी सुधि नहीं ली, उन्हें ढूँढ़ने नहीं गए, उन्हें वापस सुरक्षा में लौटा लाने नहीं गए।
यहेजकेल 34 अध्याय में इस्राएल के उन चरवाहों ने जो कुछ किया, उसके लिए शेष अध्याय परमेश्वर के क्रोध का, उनसे हिसाब लेने का, उन्हें दण्ड देने का, और कैसे परमेश्वर स्वयं अपनी भेड़ों को लौटा कर लाएगा, उनकी देखभाल करेगा, आदि बातों का वर्णन करता है। यदि आज कलीसिया के रखवाले भी वही करेंगे जो इस्राएल के उन चरवाहों ने किया, तो आज के ये पास्टर भी परमेश्वर के उसी क्रोध, न्याय, और दण्ड के भागी होंगे, जैसे वे चरवाहे हुए। वरन् कलीसिया के रखवालों को परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार कलीसिया के लोगों की रखवाली करनी है।
यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और यदि प्रभु परमेश्वर ने आपको अपनी कलीसिया के लोगों के मध्य कोई ज़िम्मेदारी दी है, तो आपकी उन्नति और आशीष अपने मसीही जीवन तथा प्रभु परमेश्वर द्वारा सौंपी गई ज़िम्मेदारी को भली भांति निभाने और परमेश्वर को प्रसन्न करने वाली सही रीति से उसका निर्वाह करते रहने से ही है। परमेश्वर के वचन के सच्चाइयों को सीखने और सिखाने में समय लगाएं, शैतान द्वारा गलत शिक्षाओं को फैलाने वाले झूठे प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं (2 कुरिन्थियों 11:13-15) की गलत शिक्षाओं को समझने, जाँचने-परखने और उनसे बच कर चलने, तथा औरों को सचेत करने में संलग्न रहें (यहूदा 1:20-23)।
यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।
और
कृपया अपनी स्थानीय भाषा में अनुवाद और प्रसार करें
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The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 56
Pastors, Their Role & Functions (2)
In the last article we had begun to consider the fourth ministry given in Ephesians 4:11, that of being a pastor or caretaker, a shepherd of God's flock. We had seen and understood on the basis of the word used here in the original Greek language that the ministry of the Pastor is similar to that of a shepherd or caretaker of the sheep. The Word also teaches us that the Lord Jesus is the "Chief Shepherd" and all the other Pastors or caretakers have to function like Him and fulfill their responsibilities under Him; since every shepherd will eventually have to give an account to the Lord. Then we had seen from Psalm 23, the ways the shepherds have to fulfill their responsibilities in a positive manner. Today too we will once again see from the Old Testament about the negative attitude and irresponsible behavior of the shepherds.
In contrast to the positive example of a Godly Pastor given in Psalm 23, God in His Word, in Ezekiel 34, has given the negative description of the callous, irresponsible, uncaring shepherds of Israel, who by their disobedience to God, allowed His sheep, the people of Israel to suffer. God severely denounces them and their ways, and tells them of His judgment and punishment for them and how He will gather together and take care of His sheep. In Ezekiel 34:2-6 is given the irresponsible and wrong behavior of the shepherds, and the rest of the chapter tells about God taking hold of the situation, bringing it under control, gathering together and taking proper care of His sheep; of taking an account from the shepherds and dispensing their due punishment upon them.
We see from Ezekiel 34:2-6 the irresponsible and wrong behavior of the shepherds:
* Verse 2 - They would feed themselves, but did not feed their flocks.
* Verse 3 - They made provisions of the best food and clothing for themselves, but made no arrangements of proper food for the flocks.
* Verse 4 - They did not take care or bother about helping the weak, the sick, the wounded in the flock. Nor did those shepherds go seeking after and bring back those who had been driven away or got lost. Rather, they ruled over the flock with force and cruelty.
* Verse 5 - Because at the required time and need, the shepherds were not present with the sheep, the sheep were scattered and became food for the wild beasts.
* Verse 6 - The shepherds never bothered about the sheep, even though they were scattered and wandered here and there; they never went searching for them nor did they restore them back to security.
What those elders of Israel, those wayward shepherds of Israel did in Ezekiel 34, the rest of chapter 34 details the anger and wrath of God; speaks of how He will take an account and punish them. The chapter also speaks of how God will bring back His sheep and take proper care of them. If today, the Pastor, i.e., the shepherd of God’s flock will do what those shepherds of Israel did, then they too will be similarly called to account and suffer the anger, wrath, and punishment from God, as those shepherds did at that time. Therefore, the present-day Pastors are not to do any of that, but take care of the flock, the Church entrusted to him, just as God instructs him to do.
If you are a Christian Believer, and if God has given you a responsibility amongst His people, then your edification, growth, and blessings are in diligently fulfilling the responsibility in the manner that pleases God. Utilize your time in learning and teaching the truths of God’s Word; and be careful to learn about, identify, stay safe and warn others about the false apostles and prophets, and their wrong teachings (2 Corinthians 11:13-15), infiltrated amongst God’s people by Satan; save others from falling prey to Satan’s devices (Jude 1:20-23).
If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.
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